जिस को तुम शौक से चाहो वो ग़ज़ल कहनी है

बज़्म में तुम भी चले आओ ग़ज़ल कहनी है

लब व रुख़्सार पे तेरी नहीं लिखना है अभी
ज़िक्र जिस
में मेरी माँ का हो ग़ज़ल कहनी है

दूर से सिर्फ़ सदाएँ ही तो आती है सनम
तू जो आग़ोश में आए तो ग़ज़ल कहनी है

मेरी क़िस्मत में सबक़ प्यार का अब है ही नहीं
मेरी क़िस्मत में है कहनी सो ग़ज़ल कहनी है

एक से एक घटा रंज न कर तू इस का
तू हुनर-मंद है तुझ को तो ग़ज़ल कहनी है

— Rajnish Vishwakarma

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