मशवरा है मेरा सभी के लिए
कोई होता नहीं किसी के लिए
राह में इश्क़ मिल गया मुझ को
मैं तो निकला था ख़ुद-कुशी के लिए
आसमाँ से फ़िरिश्ते आते हैं
उन के कूचे में हाज़री के लिए
उस की तस्वीर देख लेता हूँ
बुझती आँखों की रौशनी के लिए
बस दिवानों पे खुलता है सहरा
दिल नहीं है मेरा सभी के लिए
बा'द में बन गए वो अफ़साने
मैं तो लिखता था डाइरी के लिए
इल्म भी चाहिए मगर 'मिर्ज़ा'
इश्क़ लाज़िम है शा'इरी के लिए
— Rehan Mirza















