झूठे ख़ुदा की बंदगी में आग लग गई

मुझ को भी ख़ुद सुपुर्दगी में आग लग गई

मेरी तरफ़ से मैं ने उसे फूल क्या दिया
दोनों तरफ़ से दोस्ती में आग लग गई

कुछ लोग मेरी ज़िन्दगी में ख़ास लोग थे
उन को भी मेरी रौशनी में आग लग गई

बादल हमारे गांव से आगे निकल गए
फ़सलें उजड़ गईं नदी में आग लग गई

बिरहा के दुख संजो के मैं ने शे'र क्या कहे
उस्ताद मेरी शा'इरी में आग लग गई

इक दिन हमारे सर से कोई हाथ उठ गया
इक दिन हमारी ज़िन्दगी में आग लग गई

— Rishabh Sharma

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