पराए शहर में इक दोस्त की जगह थी वो
कि सुख में जिस्म थी और दुख में मसखरा थी वो
वो लड़-झगड़ के मेरे पास लौट आती थी
पहाड़ों पर से कोई दी हुई सदा थी वो
शरीफ़ लड़कियों के दिल जो मैं ने तोड़े थे
उन्हीं की भेजी हुई एक बद-दुआ थी वो
— Rishabh Sharma
कि सुख में जिस्म थी और दुख में मसखरा थी वो
वो लड़-झगड़ के मेरे पास लौट आती थी
पहाड़ों पर से कोई दी हुई सदा थी वो
शरीफ़ लड़कियों के दिल जो मैं ने तोड़े थे
उन्हीं की भेजी हुई एक बद-दुआ थी वो
Other ghazal from the same pen
Shers of peace.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling