बिना ग़लती ही अपने हमनशीं पर शोर कर बैठे
कहीं ग़ुस्सा हुए थे हम कहीं पर शोर कर बैठे
हमें रुतबा दिखाना था मगर डर भी था अंदर से
सो जो गूँगे लगे हम को उन्हीं पर शोर कर बैठे
कहाँ छोड़ा हम आदम ने भला क़ुदरत को पहले सा
फ़लक पर शोर कर बैठे ज़मीं पर शोर कर बैठे
जहाँ हक़ की लड़ाई थी वहाँ चुप-चाप थे लेकिन
जहाँ चुप-चाप रहना था वहीं पर शोर कर बैठे
— Rituraj kumar















