"ख़्वाब"
कभी मैं कह नहीं पाया कि तुझ से वास्ता क्या है
तू मेरे दिल मेरी धड़कन मेरी साँसों का हिस्सा है
तेरा होना भी है मुझ को मगर होने से डरता हूँ
तुझे पाया नहीं फिर भी तुझे खोने से डरता हूँ
मेरी जाँ तू मेरे ख़्वाबों ख़यालों में ही रहती है
मैं इक पागल दिवाना हूँ हमेशा मुझ से कहती है
मगर जो तू हक़ीक़त में कभी आए तो जानेगी
मुझे कितनी मोहब्बत है जो देखेगी तो मानेगी
अगर ये ख़्वाब सच होता तो हम तुम साथ में रहते
सताती तू मुझे दिनभर तो सारा दिन मनाती भी
बिना मतलब की बातों पर तू मुझ से रूठ जाती भी
सुनो ना जाँ ज़रा सी बात पर रूठा नहीं करते
मगर ये चाँद तारे भी तो अब टूटा नहीं करते
भला कैसे मैं ये कह दूँ कि इनको तोड़ लाऊँगा
हवाओं को घटाओं को फ़िज़ा को मोड़ लाऊँगा
तेरी हर इक अदा पे हम ये दिल हारे हैं मेरी जाँ
तो तेरे सामने क्या चाँद क्या तारे है मेरी जाँ
मेरे बस में बस इतना हो कि तुझ को जीत पाऊँ मैं
तेरे दिल की हर इक ख़्वाहिश को जाँ अपना बनाऊँ मैं
मेरी पलकों के साए में तू अपने ख़्वाब रख देना
परेशानी के भी अपने सभी अस्बाब रख देना
मैं तेरे वास्ते फिर इक नई दुनिया बनाऊँगा
तुझे ही याद रखूँगा जहाँ को भूल जाऊँगा
फिर इक इक कर के सारे राज़ दिल के खोल दूँगा मैं
यहाँ जो कह नहीं पाया वहाँ वो बोल दूँगा मैं















