जो तू नहीं है तो भी ये इंतिज़ार तो है

मायूस है भले दिल पर बे-क़रार तो है

तू ने तसल्ली सी दी यूँ आके ख़्वाबों में जो
ये तन्हा रात तो अब कुछ ख़ुश-गवार तो है

तस्वीर हट गई है मेरे ये बटवे से पर
इक मुस्तक़िल निशाँ है जिस से वो ज़ार तो है

सूखा गुलाब देखूँ अपनी किताब में जब
खु़श्बू वजूद में वो यूँ बरक़रार तो है

फ़ुर्सत मिले तो तेरी यादों में ही रहूँ मैं
कुछ पल का ही सही पर कोई क़रार तो है

मालूम है करेगा बर्बाद इश्क़ मुझ को
तेरा जुनूँ यूँ मुझ पर अब भी सवार तो है

मजनूँ समझ में आया वो उस की कैफ़ियत भी
नफ़्स-ओ-ख़याल पर यूँ छाया ख़ुमार तो है

— Dr Faisal siddiqui

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