किसी की नज़र का दिवाना बनूँ
किसी के लबों का तराना बनूँ
तू बन कर मुसाफ़िर अगर आ गया
तिरी रात का मैं ठिकाना बनूँ
दराज़ों को जो भेदने हैं लगे
चले तीर और मैं निशाना बनूँ
दे दूँ देह अपनी सभी पुर्ज़े भी
कि मरते हुए भी ख़ज़ाना बनूँ
हमेशा से आँखों में चुभता रहा
कभी दर्द कोई पुराना बनूँ
— Sachin Sharma















