फ़ासले हैं दोस्तों से यूँँ हमारे
सागरों ने छोड़े हों जैसे किनारे
क़ुर्बतों में जी रहे थे जिन की अब तक
चौखटों से लेते हैं मुँह फेर सारे
अजनबी तक ने निभाया साथ ऐसा
अजनबी ने कम से कम दो दिन गुज़ारे
हाँ समझ आने लगी दुनिया हमें अब
सो हमें जो भी मिले पागल पुकारे
आसमाँ में बस सफ़र करते रहे और
बिखरे धरती पर आ सपनों के सितारे
एक दिन हम कर्ण भी बन जाएँ लेकिन
मित्र कह कर कोई दुर्योधन पुकारे
हँसना अन्वेषी बड़ा भारी पड़ा है
हँस रहे हैं 'आशिक़ी और ग़म के मारे
— Ashkrit Tiwari















