नक्काशी कर तजुर्बों की बेहाल हो गए

और इस रवानी में मेरे कम बाल हो गए

थी शक्ल एक देखने और कुछ सुनाने को
शायद उसे भी याद किए साल हो गए

आते हैं लोग जल्दी यहाँ जाते देरी से
सरकारी दफ़्तरों से मेरे हाल हो गए

इस को मलाल कोई या तो दुख कहूँ मैं अब
माली गुलाब तोड़ के ख़ुशहाल हो गए

मैं छू रहा बदन की तेरी सिलवटों को यूँ
लिखते हुए ये हाथ मेरे इज्माल हो गए

— Ashkrit Tiwari

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