आईना कितना साफ़ हो अच्छा नहीं होता कभी
चेहरे बदलता आदमी सच्चा नहीं होता कभी
कोई कमी शायद या कुछ तो ऐब हावी हैं मेरे
कोई मेरा हो कर भी तो मेरा नहीं होता कभी
जैसे जिया है दर्द को वैसी ही लिख डाली ग़ज़ल
तुम तो समझते हो मगर ऐसा नहीं होता कभी
सब को नफ़ा'-नुकसान की ही याद आती हैं यहाँ
जो इश्क़ हो साहब तो फिर सौदा नहीं होता कभी
इस बार अन्वेषी गले मिलना तो ये मत भूलना
वो ऐसा आधा चांँद है पूरा नहीं होता कभी
— Ashkrit Tiwari















