कहानी के बेबाक किरदार निकले
शब-ए-ग़म के मेरे गुनहगार निकले
न था जिक़्र लंबे समय से किसी का
लहू निकला तो नाम दो-चार निकले
छिपा था मेरे दिल में मोती ग़ज़ल का
वो क़ातिल के ख़ंजर से अश'आर निकले
मैं भी डूब जाता डुबाने को जब से
मेरे अपने हर रोज़ तैयार निकले
कहा भी मुझे जाने को ऐसे उस ने
न दम निकला हम सिर्फ़ बेज़ार निकले
— Ashkrit Tiwari















