अफ़सोस का मक़ाम है अफ़सोस कीजिए
हर क़िस्सा ना-तमाम है अफ़सोस कीजिए
शमशीर बे-नेआम है अफ़सोस कीजिए
हर सम्त क़त्ल-ए-आम है अफ़सोस कीजिए
रहज़न भी नेक-नाम है अफ़सोस कीजिए
क़ातिल का एहतिराम है अफ़सोस कीजिए
रिन्दों को एक बूँद मुयस्सर नहीं यहाँ
बिगड़ा हुआ निज़ाम है अफ़सोस कीजिए
शर्मिंदगी की बात है इस दौर का बशर
शैतान का ग़ुलाम है अफ़सोस कीजिए
मातम है मय-कदे में सुराही उदास है
किस तरह इंतिज़ाम है अफ़सोस कीजिए
मंज़र कोई नहीं है नहीं रंग-ओ-बू मगर
शादाब मेरा नाम है अफ़सोस कीजिए
— Shadab Shabbiri















