बड़े ख़ुलूस से मुझ से सलाम करते हैं

न जाने क्यूँ वो मेरा एहतिराम करते हैं

अदा-ओ-नाज़ से जीना हराम करते हैं
सितम ये है कि सितम वो मुदाम करते हैं

कभी-कभी तेरे ख़्वाब-ओ-ख़याल से हट कर
जुनूँ में ख़ुद से ही ख़ुद ही कलाम करते हैं

बिछड़ गए हैं कई साल क़ब्ल ही लेकिन
वो कू-ए-दिल में अभी तक ख़िराम करते हैं

मैं सुन रहा हूँ मगर कुछ यक़ीं नहीं आता
कि मुझ को याद वो अब सुब्ह-ओ-शाम करते हैं

मिले न एक किरन भी मगर हक़ीक़त है
कि हम भी ख़्वाहिश-ए-माह-ए-तमाम करते हैं

मैं ख़्वाब देख रहा हूँ वहाँ गया हूँ मैं
मिरे क़याम का वो इंतिज़ाम करते हैं

बदल के मक़्ते में शादाब शेर-ए-आख़िर को
चलो ग़ज़ल का यहीं इख़्तिताम करते हैं

— Shadab Shabbiri

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