aah mazloom ke gar dil se nikal jaati hai | आह मज़लूम के गर दिल से निकल जाती है

  - Shajar Abbas

आह मज़लूम के गर दिल से निकल जाती है
हाकिम-ए-वक़्त ये मसनद को निगल जाती है

हौसला आपका फ़ौलाद सा हो जाता है
मोम की तरह से चट्टान पिघल जाती है

रब से माँगा करो रो-रो के दुआओं में मुझे
कि दुआओं से न तक़दीर बदल जाती है

जिस तरह बच्चा मचलता है खिलौने के लिए
इस तरह देख के वो मुझको मचल जाती है

बल नहीं जाते हैं रस्सी के हक़ीक़त है शजर
मान ले बात मेरी रस्सी तो जल जाती है

  - Shajar Abbas

Protest Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Shajar Abbas

As you were reading Shayari by Shajar Abbas

Similar Writers

our suggestion based on Shajar Abbas

Similar Moods

As you were reading Protest Shayari Shayari