कल ये पैग़ाम हर इक पीर-ओ-जवाँ तक पहुँचे
हाल-ए-अफ़सुर्दा में हम कू-ए-बुताँ तक पहुँचे
उसने पूछा था मेरी जान कहाँ तक पहुँचे
मैने हँसकर ये कहा रिश्ता-ए-जाँ तक पहुँचे
बहरे हो जाएँ दुआ गो हूँ ये दुनिया वाले
उसका जब नाम ख़ुदा मेरी ज़बाँ तक पहुँचे
मेरे हाथों पे ये पाज़ेब जो है मेरे सनम
ख़्वाहिश-ए-कल्ब-ए-हज़ीं है तेरे पाँ तक पहुँचे
जा के हम मौत की आग़ोश में यूँँ बैठ गए
जैसे बिछड़ा हुआ बच्चा कोई माँ तक पहुँचे
मैंने ख़त देके कबूतर को कबूतर से कहा
क़ासिद-ए-इश्क़ मेरा ख़त ये फ़ुलाँ तक पहुँचे
मेरी आवाज़ पे लब्बैक कहें पीर-ओ-जवाँ
मेरी हलमिन की सदा सारे जहाँ तक पहुँचे
ख़ून से है लिक्खा है तारीख़ के औराकों पर
हक़ बयाँ करने को हम नोक -ए-सिनाँ तक पहुँचे
होंगे दीदार मय्यसर हमें हूरों के वहाँ
दिल में अरमान लिए हम ये जिनाँ तक पहुँचे
दास्ताँ मेरे सफ़र की ये है अदना सी शजर
संग खाते हुए हम कूचा-ए-जाँ तक पहुँचे
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