सदाएँ आती हैं रह रह के आओ दश्त-ए-जुनूँ
जनाब-ए-क़ैस के जैसे बसाओ दश्त-ए-जुनूँ
सुकून-ए-क़ल्ब-ए-हज़ी चाहिए अगर तुमको
तो बस्ती छोड़ के तुम यार जाओ दश्त-ए-जुनूँ
न जाओ दश्त-ए-जुनूँ छोड़कर दयार-ए-सनम
बिछड़ के कूचे को उसके बनाओ दश्त-ए-जुनूँ
फ़िराक़-ए-यार के मारे हैं सब वहाँ पे मकीं
फ़िराक़-ए-यार के मारे हो जाओ दश्त-ए-जुनूँ
लबों पे हिज्र के मारे ग़ज़ल सजाएँगे
रदीफ़ इसकी शजर तुम बनाओ दश्त-ए-जुनूँ
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