to kya hua jo mujhko mohabbat nahin mili | तो क्या हुआ जो मुझको मोहब्बत नहीं मिली

  - Shajar Abbas

तो क्या हुआ जो मुझको मोहब्बत नहीं मिली
मजनू को भी तो मजनू की चाहत नहीं मिली

जिसको जनाब-ए-क़ैस की तुर्बत नहीं मिली
उसको समझ लो दोस्तो जन्नत नहीं मिली

औराक़-ए-इश्क़ उल्टे जो मैंने मता-ए-जाँ
अपनों के दरमियाँ कहीं क़ुर्बत नहीं मिली

कैसे शरीक होता मैं बज़्म-ए-विसाल में
मुझको ग़म-ए-फ़िराक़ से फ़ुर्सत नहीं मिली

आँखों ने मेरी ओढ़ लिया अश्कों का कफ़न
जब से तुम्हारी इनको ज़ियारत नहीं मिली

गिर्या-कुनाँ हैं लाश पे लैला यूँँ क़ैस की
सहरा मिला है तुमको सुकूनत नहीं मिली

मैदान-ए-इश्क़ खा गया जज़्बात-ए-क़ल्ब को
जज़्बात-ए-क़ल्ब की हमें मय्यत नहीं मिली

जब तक रहा मैं दूर मोहब्बत से दोस्तों
तब तक मुझे ज़माने में शोहरत नहीं मिली

दो आशिकों को कर लिया सब ने शजर क़ुबूल
तारीख़-ए-इश्क़ में ये रिवायत नहीं मिली

क्यूँँकर करूँँ शजर से तक़ाबुल मैं कैस का
इसको जब उसके जैसी अज़ीयत नहीं मिली

  - Shajar Abbas

Aarzoo Shayari

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