"वो भी क्या ज़माना था"

वो भी क्या ज़माना था
तुझ को याद करने से
ज़ेहन चैन पाता था
दिल के ज़ख़्म भरते थे
तेरा नाम लेने से
इन उदास होंठो पर
झट से मुस्कुराहट के
ढेरो फूल खिलते थे
तेरा दीद करने से
कोर चश्म आँखों को
रौशनाई मिलती थी
तेरा ज़िक्र करने से
गाँव की फ़ज़ा सारी
ख़ुश गवार होती थी
एक ये ज़माना है
तुझ को याद करने से
ज़ेहन तंग होता है
दिल के ज़ख़्म खुलते हैं
इन लतीफ़ होंठो पर
ग़म की बिजली गिरती है
होंठ अब मिरे ग़म की
आग में झुलसते हैं
तेरा दीद करने से
सिर्फ़ दर्द मिलता हैं
तेरा चेहरा आँखों में
तीर बन के चुभता है
तेरा ज़िक्र करने से
गाँव की फ़ज़ा सारी
दिल मलूल होती है
ये अजब ज़माना है
सिर्फ़ इस ज़माने में
दर्द हाथ आया है
अब मैं बस ये सोचूँ हूँ
वो भी क्या ज़माना था

— Shajar Abbas

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