सवाल कर के यूँँ फ़ौरन जवाब माँगता है
गुलाब देता है वापस गुलाब माँगता है
वो आँखें माँगे तो उसके हुज़ूर पेश करूँँ
मगर वो शख़्स तो आँखों के ख़्वाब माँगता है
बता रहे हैं ये हालात दौर-ए-हाज़िर के
ये दौर फिर से नया इंक़िलाब माँगता है
अजीब बात है हर शख़्स अब ख़ुदा बनकर
मिरे गुनाहों का मुझसे हिसाब माँगता है
इसे तो शौक़ था राह-ए-वफ़ा पे चलने का
अमान क्यूँ दिल-ए-ख़ाना-ख़राब माँगता है
मैं ख़ुश-नसीब हूँ मुझसे 'शजर' मिरा महबूब
हमेशा तोहफ़े में हँसकर नक़ाब माँगता है
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