हैं हम माना अधूरे पर मोहब्बत ख़ुद में पूरी है
मोहब्बत का फ़क़त होना ही बस कितना ज़रूरी है
तिरी सोहबत में आख़िर कब ही मिलती थी ख़ुशी मुझ को
मिरा दिल फिर भी जाने माँगे क्यूँ तेरी हुज़ूरी है
रहा मैं बस हूँ कमियाँ खोजता अपनी मोहब्बत में
कहा कब है भला मैं ने कि उस की कुछ क़ुसूरी है
न जाने क्यूँँ ही उसके नाम के ख़त आते मेरे घर
बता दो डाकिए को हम में अब कोसों की दूरी है
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