इस अनोखी रस्म का नश्शा न डालो

इश्क़ वालों इश्क़ पर पहरा न डालो

किस तवक़्क़ो के लिए इतना गुमाँ है
ख़ून से फिर ख़ून का लहजा न डालो

ग़म भुलाने आए चल के मैकशी तक
ग़म भुला के फ़र्श पर बादा न डालो

आया लैला तेरे आशिक़ का जनाज़ा
क़ैस के चेहरे पे अब पर्दा न डालो

इक नविश्ते का है ये क़िस्सा भी क़ातिब
ख़ून-ए-मक़्तल में कोई रिश्ता न डालो

क़ौम के मज्में में मैं भी चल रहा हूँ
ज़ात का फिर पाँव में शीशा न डालो

रहमतों का शहर इक वीराँ पड़ा है
फिर ज़रा-सी बात पर लाशा न डालो

दीप जौदत का बुझाने में लगे हो
फिर हवा को दोष दे गिर्या न डालो

दास्तान-ए-ग़म न पूछो तुम हमारी
बस हमारे ज़र्फ़ में सिक्का न डालो

— Shivansh Singhaniya

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