इश्क़ तरसा हुआ बनाऊँगा
ग़म को हँसता हुआ बनाऊँगा
इक नया सा मकान तो होगा
जो मैं गिरता हुआ बनाऊँगा
नक्श-चेहरा बसा था आँखों में
सो वो रोता हुआ बनाऊँगा
देख सूरज कि उस जलन को मैं
अक्स जलता हुआ बनाऊँगा
कल के किस इंतिज़ार में है तू
कल तो बीता हुआ बनाऊँगा
इक घड़ी हाथ पर तो होगी शिव
वक़्त ठहरा हुआ बनाऊँगा
— Shivansh Singhaniya















