यादें उन की रखी थी जो अलमारी में

धुल गई वो सभी फिर अज़ा-दारी में

अब ये कैसी सज़ा मिल रही थी हमें
मौत भी मिल न सकती थी ग़म-ख़्वारी में
इश्क़ की फिर सजा तो हमें मिलनी थी
साथ इक शख़्स था जो गुनहगारी में

बैठ कर खा रहे है जवाँ बेटे घर
बाप भूखा कमाता है ख़ुद-दारी में

लौट आया उड़ा कर वो पैसे सभी
मर गई माँ तड़प कर जो बीमारी में

घुट रहा दम मिरा इस गिराँ-बारी से
जी रहा हूँ मैं बस यार मक्कारी में

— Shivansh Singhaniya

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