शब से ये ग़म सता रहा है मुझे
ख़ुद का साया ही खा रहा है मुझे
इस लिए दिल नहीं लगा है मेरा
यार मरना सिखा रहा है मुझे
दास्ताँ क्या थी क़ैस की लैला
ख़ुद ये सहरा बता रहा है मुझे
ज़ख़्म दिल के बता रहा है कटे
वो ग़ज़ल क्यूँ सुना रहा है मुझे
झूठ ने सच छिपा लिया पीछे
झूठ का सच सुना रहा है मुझे
एक ग़म आ बसा है फिर से वहीं
हाँ वही ग़म तो खा रहा है मुझे
मौत के इंतिज़ार में ज़िंदा
बुझता दीया जला रहा है मुझे
— Shivansh Singhaniya















