बात बस अना की थी सो कुछ नहीं सहा गया
ज़िन्दगी को जीत कर जो मौत को हरा गया
रात एक ख़्वाब में वो शख़्स जब मुझे दिखा
फिर विसाल-ए-यार का ख़याल ग़म बढ़ा गया
दास्तान ग़म का जब शुरू ये सिलसिला हुआ
इस ग़म-ए-फ़िराक़ में नफ़स नफ़स थमा गया
इक ज़रा सी बात दो दिलों को तार कर गई
उस शब-ए-फ़रोग़ में वो रूठकर चला गया
दर्द इक छिपा रखा था कब से हम ने सीने में
इक दिया जला हुआ वो फूँक कर बुझा गया
है मिरी बिसात क्या करूँ जो तम में रौशनी
है यही तो फ़ैसला ख़ुदा का सो किया गया
इस निशान-ए-दिल को हम जो बे-निशाँ लिए रहे
जो सहा था 'शिव' ने तब सो सहता ही चला गया
— Shivansh Singhaniya















