रूह इक फिर चली ज़िंदगी की तरफ़

मुफ़लिसी जैसे उस सरकशी की तरफ़

मैं ज़रा छत से बातें, जो करने लगा
फिर वो रस्सी चली ख़ुद-कुशी की तरफ़

पी नहीं ग़म में, क्या बात करते हो तुम
जाम फिर चल दिया मय कशी की तरफ़

लाज़िमी थी तिरी इश्क़ में सर ख़ुशी
जिस्म जब, चल पड़ा बिस्तरी की तरफ़

अब कहेगा कहानी दिया ख़ुद की, जब
रौशनी आ दिखी तीरगी की तरफ़

इक ग़ज़ल इश्क़ में हम कहें और तुम
दिल लगी जो हुई आशिक़ी की तरफ़

अजनबी इश्क़ था अजनबी प्यार था
कृष्ण यूँ आ गए रुक्मणी की तरफ़

— Shivansh Singhaniya

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