हम क़दम क़दम मुहाल आप क्यूँ ठहर गए

आप को है क्या मलाल आप क्यूँ ठहर गए

जल रहे है हम फ़िराक़ की सुलगती आग में
ये है, मौसम-ए-विसाल आप क्यूँ ठहर गए

जी फ़राज़-ए-मौत पे बहल रहा है आप का
आप का है ग़म विशाल आप क्यूँ ठहर गए

सुर्ख़ हो सफ़ेद हो के रंग इश्क़ का भला
क्या जुनूब से शुमाल आप क्यूँ ठहर गए

दिल बहल रहा है आप का भी किस विसाल से
इश्क़ अच्छा है ख़याल आप क्यूँ ठहर गए

कर रहा था क़त्ल वो सर-ए-जुनूँ सा बज़्म में
लफ़्ज़ लफ़्ज़ से क़िताल आप क्यूँ ठहर गए

आरज़ू-ए-वस्ल की उमीद थी उरूज़ पर
इश्क़ था या इंतिक़ाल आप क्यूँ ठहर गए

हम सुख़नवरों कि है ये दास्ताँ अज़ीब ही
आप का था क्या सवाल आप क्यूँ ठहर गए

था कभी उरूज़ पे सुख़न-सरों का हाल भी
'शिव' बचा है बोल-चाल आप क्यूँ ठहर गए

— Shivansh Singhaniya

More by Shivansh Singhaniya

Other ghazal from the same pen

See all from Shivansh Singhaniya →

Ulfat Shayari Collection

Shers of ulfat shayari collection.

All Ulfat Shayari Collection poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling