कातिब ने उस कि प्रीत को नाकाम लिख दिया

दश्त-ए-जुनूँ में क़ैस का अंजाम लिख दिया

मक़्तूब किस का, किस को ये पैग़ाम दे दिया
क़ासिद बता ये किस ने मिरा नाम लिख दिया

ग़म नोंच कर के उस ने ग़ज़ल में जो रख दिए
मग़्ज़-ए-सुख़न को जान के इल्हाम लिख दिया

हम भी भुला सके न वो काजल हिजाब का
हम नाम लिख सके न तो हमनाम लिख दिया

उस को नहीं उमीद थी दुनिया से प्रेम की
राधा ने अपने नाम में घनश्याम लिख दिया

मारा हमें लिहाज़ से कल रात बज़्म में
शाइ'र ने 'गुल' ग़ज़ल में तिरा नाम लिख दिया

क़ातिल वही 'अज़ीज़ मिरी जान का हुआ
अहल-ए-जुनूँ में क़त्ल सर-ए-आम लिख दिया

काबू रहा न 'शिव' पे तो मय तिश्नगी हुआ
ख़ुद को सुख़न की चाह में ख़य्याम लिख दिया

— Shivansh Singhaniya

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