नूर बरसा है किस आशियाँ से

धूप आती है महविश कहाँ से

अब न हम को तलाशा करो तुम
हम फ़ना हो गए है जहाँ से

है निगोड़ी मोहब्बत ये कैसी
गुफ़्तूगू कर रहा रफ्तगाँ  से

तू गुमाँ कर न अपनी जबीं पर
दास्ताँ बन गई दास्ताँ से

तुम न रूठो मोहब्बत से इतना
उठ चले हम तेरे आस्ताँ से

उम्र भर क़ैद दिल में रहेंगे
हम न उफ़ भी करेंगे ज़बाँ से

रात है जाम-ख़ोशा-ए-महफ़िल
ख़ूब गुज़री है पीर-ए-मुग़ाँ से

अश्क-ए-दीदा हुए इश्क़-ए-ग़ाफ़िल
ज़हर उतरा नहीं जिस्म-ओ-जाँ से

तुम बताओ मैं जाऊँ कहाँ अब
शिव गया हार इस इम्तिहाँ से

— Shivansh Singhaniya

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