और कितने ग़म उठाने हैं हमें इस ज़िंदगी में
ऐ ख़ुदा धोखे पे धोखे मिल रहें हैं दोस्ती में
ग़म मिलें ख़ुशियाँ मिलें हद में मिलें तो ठीक वर्ना
कुछ नहीं दिखता ज़रुरत से ज़ियादा रौशनी में
एक दिल था पास मेरे और वो भी खो गया है
छोड़ आई हूँ तुम्हारे पास शायद हड़बड़ी में
कल मुझे तोहफ़े में उसने काँच के कंगन दिए थे
लग रहा था चाँद तारे दे दिए हों तश्तरी में
चार दिन की ज़िंदगी है एक दिन मरना है सबको
यार छोड़ो ये लड़ाई क्या रखा है दुश्मनी में
तुम कली हो इस सियासत से तुम्हें क्या लेना देना
प्यार होना चाहिए बेहद तुम्हारी शायरी में
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