रात हम सेे न बसर की जाए
आँख ये मुझ'से उधर की जाए
देख लो हाल मेरा सोचो फिर
अब कहीं और नज़र की जाए
चुप है, कुछ बोल,बता जो भी हो
बात उस की न मगर की जाए
एक बोतल कि बची है कल से
अब चलो शाम बसर की जाए
था मैं बद-नाम मगर पहले था
अब तो उँगली न इधर की जाए
— Subodh Sharma "Subh"















