लगा ये बाहों में भरकर वो इतने नाज़ुक हैं
के जैसे रूई का बिस्तर वो इतने नाज़ुक हैं
पलट के आ गया मैं दर पे दस्तकें देकर
निकल के आए न बाहर वो इतने नाज़ुक हैं
ज़रा हवा में जो निकलें तो छींक आजाए
सो बंद रहते हैं अक़्सर वो इतने नाज़ुक हैं
गले में रह के दुपट्टे ने ख़ुद-कुशी करली
कि ओढ़ते नहीं सर पर वो इतने नाज़ुक हैं
उठा के गोद में देखा हज़ार बार उन को
के जैसे फूस का छप्पर वो इतने नाज़ुक हैं
ज़रा सी बात पर आए थे क़त्ल करने को
उठा न हाथ से ख़ंजर वो इतने नाज़ुक हैं
अब इस से बढ़ के भला और क्या कहें 'तलहा'
बदन पे बोझ है ज़ेवर वो इतने नाज़ुक हैं
— Talha Lakhnavi















