Talha Lakhnavi

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@Talha_Lakhnavi

Talha Lakhnavi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Talha Lakhnavi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

इक तरफ़ हुस्न-ए-तबस्सुम इक तरफ़ हुस्न-ए-हया और उस पर जान लेवा आप की अँगड़ाई है — Talha Lakhnavi
तेरी हर अदा है दिलकश तेरा हुस्न दिलरुबा है तुझे जब से मैं ने देखा मुझे इश्क़ हो गया है — Talha Lakhnavi
ज़बाँ से अपने न हम कहें कुछ न वो कहें कुछ नज़र समझ ले नज़र की हरकत वो शा'इरी है — Talha Lakhnavi
तेरी ता'रीफ़ बताने को ग़ज़ल कहते हैं हम कहाँ नाम कमाने को ग़ज़ल कहते हैं — Talha Lakhnavi
कुछ तसल्ली मेरे दिल को पल दो पल हो जाएगी देख ली तस्वीर तेरी अब ग़ज़ल हो जाएगी — Talha Lakhnavi
इस एक फ़िक्र ने हैरान कर दिया है मुझे फ़लक पे चाँद तो आया है तुम नहीं आए — Talha Lakhnavi
कभी सोचा है तुम ने क्या गुज़रती है दिवाने पर के जब तुम ज़ुल्फ़ बिखरा कर निकल आते हो शाने पर — Talha Lakhnavi
तुझे याद करते करते मैं ये सोचता हूँ अक्सर तेरा हिज्र भी न हो तो मेरे पास और क्या है — Talha Lakhnavi
जो अपने लफ़्ज़ों से हिज्र तोड़े मोहब्बतों में दिलाए फिर दो दिलों को राहत वो शा'इरी है — Talha Lakhnavi
हम सेे जो दूर रहा करते हैं उन को अक्सर दिल की आवाज़ सुनाने को ग़ज़ल कहते है — Talha Lakhnavi
हमें हासिल हैं दुनिया के ख़ज़ाने मगर कुछ फिर भी कम है लौट आओ — Talha Lakhnavi
जब से मैं बिछड़ा हूँ तुम से तब से बस ये चाह है फिर कोई माज़ी की राहों से मुझे आवाज़ दे — Talha Lakhnavi

Ghazal

तेरी हर अदा है दिलकश तेरा हुस्न दिलरुबा है तुझे जब से मैं ने देखा मुझे इश्क़ हो गया है पड़े तुझ पे कोई मुश्किल तो मुझे पुकार लेना मेरी जान तुझ पे दिल क्या मेरी जान भी फ़िदा है रहे इश्क़ में किसी की मुझे अब नहीं ज़रूरत तेरा साथ चाहता था तेरा साथ मिल गया है कोई और अक्स इस में कभी रू नुमा न होगा तेरे आइने से बेहतर मेरे दिल का आइना है तुझे याद करते करते मैं ये सोचता हूँ अक्सर तेरा हिज्र भी न हो तो मेरे पास और क्या है मेरे जज़्बा-ए-दिली कि जो सदा समझ न आए उसे मोतबर समझिए जो क़लम ने लिख दिया है रहे बेख़ुदी पे तलहा कोई दूर तक नहीं है मेरा अक्स ही मुसलसल मेरे साथ चल रहा है — Talha Lakhnavi
यादों से अपनी मेरे जज़बात-ए-दिल जगा के सोए हैं चैन से वो नींदें मिरी उड़ा के महफ़िल में मेरा आना हो जाएगा सुआरत इक बार देख लें वो नज़रें अगर उठा के लब खोलने की मुझ को मिल जाए गर इजाज़त अपना बनाऊँ तुम को अपनी ग़ज़ल सुना के दो फूल ज़ौ-फ़िशाँ हैं जो गेसुओं में उन के मुझ को बुला रहे हैं ख़ुशबू लुटा लुटा के वैसे तो तुम को तन्हा सब छोड़ कर गए हैं इक बार देख लेना हम को भी आज़मा के मैं सोचता हूँ उन की ता'रीफ़ में लिखूँ क्या अंदाज़ हैं ग़ज़ब के तेवर भी हैं बला के तलहा ये रंग यूँँ ही आए नहीं ग़ज़ल में हम साथ चल रहे हैं बहती हुई हवा के — Talha Lakhnavi
लगा ये बाहों में भरकर वो इतने नाज़ुक हैं के जैसे रूई का बिस्तर वो इतने नाज़ुक हैं पलट के आ गया मैं दर पे दस्तकें देकर निकल के आए न बाहर वो इतने नाज़ुक हैं ज़रा हवा में जो निकलें तो छींक आजाए सो बंद रहते हैं अक़्सर वो इतने नाज़ुक हैं गले में रह के दुपट्टे ने ख़ुद-कुशी करली कि ओढ़ते नहीं सर पर वो इतने नाज़ुक हैं उठा के गोद में देखा हज़ार बार उन को के जैसे फूस का छप्पर वो इतने नाज़ुक हैं ज़रा सी बात पर आए थे क़त्ल करने को उठा न हाथ से ख़ंजर वो इतने नाज़ुक हैं अब इस सेे बढ़ के भला और क्या कहें 'तलहा' बदन पे बोझ है ज़ेवर वो इतने नाज़ुक हैं — Talha Lakhnavi
कौन आएगा भला मेरी अयादत के लिए मैं अगर बीमार हो जाऊँ मुहब्बत के लिए दिल के मैं जज़्बात कहने के लिए तैयार हूँ मुंतज़िर हैं लब मगर उन की इजाज़त के लिए सिर्फ़ यक-तरफ़ा मुहब्बत से नहीं बनती है बात हौसला भी चाहिए इज़हार-ए-उल्फ़त के लिए कब तलक दो दिल भला चाहत में संजीदा रहें एक दिन तो चाहिए थोड़ी शरारत के लिए सादगी मेरी मुझे नुक़सान पहुँचाती है यूँँ लोग मुझ को याद करते हैं ज़रूरत के लिए जीते जी बोए थे काँटे जिस ने मेरी राह में फूल ले के आ रहा है आज तुर्बत के लिए मैं अगर 'तलहा' लिखूँ कोई नज़ाकत पर किताब लफ़्ज़ कम पड़ जाएँगे उन की नज़ाकत के लिए — Talha Lakhnavi
करे जो ज़ाहिर दिलों की हालत वो शा'इरी है बयान कर दे जो हर हक़ीक़त वो शा'इरी है ज़माना सुन सुन के हो गया है जिसे दिवाना बढ़ी है शाइ'र कि जिस सेे क़ीमत वो शा'इरी है ख़मोश लब जो हया के परदे में हर घड़ी हैं जो उन के लहजे में है नफ़ासत वो शा'इरी है बहाना करते है रोज़ झूठा मुझे पता है फिर उस पे करते है जो वज़ाहत वो शा'इरी है ज़बाँ से अपने न हम कहें कुछ न वो कहे कुछ नज़र समझ ले नज़र की हरकत वो शा'इरी है जो अपने लफ़्ज़ों से हिज्र तोड़े मोहब्बतों में दिलाए फिर दो दिलों को राहत वो शा'इरी है ज़माना जिस सेे भी चाहे दिल को लगाए लेकिन है जिस से तलहा मुझे मुहब्बत वो शा'इरी है — Talha Lakhnavi
ग़मों से जब था मैं दो चार तब कहाँ थे तुम नहीं था जब कोई ग़म-ख़वार तब कहाँ थे तुम ख़ुदा के फ़ज़ल से सब कुछ है अब हमें हासिल न कुछ था जब तो मेरे यार तब कहाँ थे तुम पुकारते थे मुझे सब तुम्हारा आशिक़ जब सड़क पे चलना था दुश्वार तब कहाँ थे तुम जहाँ में इश्क़ की क़ीमत ही अब नहीं कोई था गर्म जब के ये बाज़ार तब कहाँ थे तुम ज़बाँ को जकड़ा है मेरी तुम्हारी फ़ुर्क़त ने यही कहूँगा मैं हर बार तब कहाँ थे तुम चले गए थे मुझे छोड़ कर सभी तन्हा नहीं था कोई मददगार तब कहाँ थे तुम कहा है मुझ सेे मेरे दिल ने आज ये तलहा हुआ था जब के मुझे प्यार तब कहाँ थे तुम — Talha Lakhnavi
तेरी ता'रीफ़ बताने को ग़ज़ल कहते हैं हम कहाँ नाम कमाने को ग़ज़ल कहते हैं जब तेरी आँखों से पी लेते हैं इक जाम कभी ख़ुद को फिर होश में लाने को ग़ज़ल कहते हैं जब कभी हम सेे ख़फ़ा होती है वो जाने ग़ज़ल रात फिर उस को मनाने को ग़ज़ल कहते हैं दूसरों के लिए हम राह-ए-अदब पर चल कर नक़्श-ए-पा अपना बनाने को ग़ज़ल कहते हैं हम सेे जो दूर रहा करते हैं उन को अक्सर दिल की आवाज़ सुनाने को ग़ज़ल कहते हैं ज़िंदगी फ़िल्म की मानिंद हुई है जबसे अपना किरदार निभाने को ग़ज़ल कहते हैं एक हम ही नहीं जितने भी हैं शाइ'र तलहा अपनी पहचान बनाने को ग़ज़ल कहते हैं — Talha Lakhnavi
तुम्हें मेरी क़सम है लौट आओ मेरे होंठों पे दम है लौट आओ तुम्हारे बा'द मेरी ज़िन्दगी में मुसलसल ग़म ही ग़म है लौट आओ तुम्हें ग़म हो न हो फ़ुर्क़त का लेकिन मुझे रंज-ओ-अलम है लौट आओ हमें हासिल हैं दुनिया के ख़ज़ाने मगर कुछ फिर भी कम है लौट आओ तुम्हारे बिन ग़ज़ल मेरी है ज़ख़्मी लहू रोता क़लम है लौट आओ तुम्हें बिस्तर की चादर ढूँढ़ती है मेरा तकिया भी नम है लौट आओ समझ लो अब मोहब्बत का हमारी यही दूजा जनम है लौट आओ तुम्हीं से घर मेरा अब घर बनेगा यही मेरा भरम है लौट आओ मैं अक्सर ख़्वाब में कहता हूँ उस सेे कि अब जीना सितम है लौट आओ — Talha Lakhnavi
तुम सेे बिछड़े तो हम शे'र कहने लगे सह के दुनिया के ग़म शे'र कहने लगे बे-वफ़ाई तेरी हौसला दे गई इतने टूटे सितम शे'र कहने लगे तेरे जाने से ये फ़ाइदा तो हुआ आज हम कम से कम शे'र कहने लगे गर भरोसा न हो आके ख़ुद देख लो हम तुम्हारी क़सम शे'र कहने लगे ज़िंदगी में कई बार ऐसा हुआ जब भी रूठा सनम शे'र कहने लगे जब अचानक कभी याद तुम आ गए हो गई आँख नम शे'र कहने लगे तेरे आने की जिस दम ख़बर मिल गई आ गया दम में दम शे'र कहने लगे इक तअ़ल्लुक़ वफ़ाओं का रक्खा मगर जब भी टूटा भरम शे'र कहने लगे नींद 'तलहा' न जब रात को आई तो ले के काग़ज़ क़लम शे'र कहने लगे — Talha Lakhnavi
मेरा यार दुनिया में सब सेे हसीं है बड़ा ख़ूब-सूरत बड़ा दिलनशीं है अगर उस की ज़ुल्फ़ें हैं काली घटा सी तो सूरत भी कुछ चाँद से कम नहीं है भला और क्या अब मैं माँगू ख़ुदा से फ़लक सर पे, पैरों के नीचे ज़मीं है उसे रब ने मेरे लिए ही बनाया ये मेरा यक़ीं है,ये मेरा यक़ीं है उसे देख कर इतना मदहोश हूँ मैं निगाहें कहीं हैं, निशाना कहीं है तुम्हारे बिना अब नहीं है गुज़ारा जहाँ तुम हो अब मेरी दुनिया वहीं है निगाहों से इक बार बोसा लिया था तसव्वुर में हर वक़्त उस की जबीं है ख़यालों में जिस के मैं खोया हूँ तलहा वो इक गुल-बदन बा-हया नाज़नीं है — Talha Lakhnavi