करे जो ज़ाहिर दिलों की हालत वो शा'इरी है
बयान कर दे जो हर हक़ीक़त वो शा'इरी है
ज़माना सुन सुन के हो गया है जिसे दिवाना
बढ़ी है शाइ'र कि जिस से क़ीमत वो शा'इरी है
ख़मोश लब जो हया के परदे में हर घड़ी हैं
जो उन के लहजे में है नफ़ासत वो शा'इरी है
बहाना करते है रोज़ झूठा मुझे पता है
फिर उस पे करते है जो वज़ाहत वो शा'इरी है
ज़बाँ से अपने न हम कहें कुछ न वो कहे कुछ
नज़र समझ ले नज़र की हरकत वो शा'इरी है
जो अपने लफ़्ज़ों से हिज्र तोड़े मोहब्बतों में
दिलाए फिर दो दिलों को राहत वो शा'इरी है
ज़माना जिस से भी चाहे दिल को लगाए लेकिन
है जिस से तलहा मुझे मुहब्बत वो शा'इरी है















