एक तो हुस्न-ए-यार आफ़त है
उस पे सोलह शृंगार आफ़त है
इक क़यामत है उस का चुप रहना
मुस्कुराना हज़ार आफ़त है
जानलेवा है हर अदा उस की
उस की नज़रों का वार आफ़त है
उस की गर्दन सुराही जैसी है
और रुख़ का निखार आफ़त है
उस की आँखें छलकते पैमाने
जिन में मय का ख़ुमार आफ़त है
यूँ तो लाखों हसीन हैं लेकिन
जिस से मुझ को है प्यार आफ़त है
उस के जैसा नहीं कोई तलहा
हम कहें जिस को यार आफ़त है
— Talha Lakhnavi















