तुम्हें मेरी क़सम है लौट आओ
मेरे होंठों पे दम है लौट आओ
तुम्हारे बा'द मेरी ज़िन्दगी में
मुसलसल ग़म ही ग़म है लौट आओ
तुम्हें ग़म हो न हो फ़ुर्क़त का लेकिन
मुझे रंज-ओ-अलम है लौट आओ
हमें हासिल हैं दुनिया के ख़ज़ाने
मगर कुछ फिर भी कम है लौट आओ
तुम्हारे बिन ग़ज़ल मेरी है ज़ख़्मी
लहू रोता क़लम है लौट आओ
तुम्हें बिस्तर की चादर ढूँढ़ती है
मेरा तकिया भी नम है लौट आओ
समझ लो अब मोहब्बत का हमारी
यही दूजा जनम है लौट आओ
तुम्हीं से घर मेरा अब घर बनेगा
यही मेरा भरम है लौट आओ
मैं अक्सर ख़्वाब में कहता हूँ उस से
कि अब जीना सितम है लौट आओ
— Talha Lakhnavi















