मिल गई उन सेे जब इक नज़र ईद में
कम हुआ मेरा दर्द ए जिगर ईद में
क्यूँ नज़र डालूँ मैं चाँद पर ईद में
साथ मेरा है जब हम सफ़र ईद में
ये यक़ीं है मिरा मुझ से मिलते ज़रूर
उन का आना जो होता इधर ईद में
चाँद को देखने छत पे वो आ गए
मेरी चाहत का है ये असर ईद में
वो हसीं जिन के घर में भी दाख़िल हुआ
जगमगाने लगे उन के घर ईद में
उन से मिल कर न जब बुझ सकी तिश्नगी
बे क़रारी रही रात भर ईद में
ईद में ईद जैसी नहीं है ख़ुशी
सूना सूना है तलहा का घर ईद में
— Talha Lakhnavi















