तेरी आँखों के इशारों में नहीं आएँगे
हम नज़ारा है नज़ारों में नहीं आएँगे
ग़म के मौसम भी ज़रूरी हैं ख़ुशी के हमराह
हिज्र के लुत्फ़ बहारों में नहीं आएँगे
हम से चाहत जो अदावत के लिए रखते हैं
यार हो कर भी वो यारों में नहीं आएँगे
हम से मिलना है तो कुछ उन से अलग हट के मिलो
हम कभी वक़्त गुज़ारों में नहीं आएँगे
ख़ुश नसीबी है तुम्हारी के तुम्हें मुफ़्त मिले
वरना हम जैसे हज़ारों में नहीं आएँगे
चार ही हर्फ़ है तलहा में के बेदाग़ हैं वो
और नुक़्ते कभी चारों में नहीं आएँगे
— Talha Lakhnavi















