यादों से अपनी मेरे जज़बात-ए-दिल जगा के
सोए हैं चैन से वो नींदें मिरी उड़ा के
सोए हैं चैन से वो नींदें मिरी उड़ा के
महफ़िल में मेरा आना हो जाएगा सुआरत
इक बार देख लें वो नज़रें अगर उठा के
लब खोलने की मुझ को मिल जाए गर इजाज़त
अपना बनाऊँ तुम को अपनी ग़ज़ल सुना के
दो फूल ज़ौ-फ़िशाँ हैं जो गेसुओं में उन के
मुझ को बुला रहे हैं ख़ुशबू लुटा लुटा के
वैसे तो तुम को तन्हा सब छोड़ कर गए हैं
इक बार देख लेना हम को भी आज़मा के
मैं सोचता हूँ उन की ता'रीफ़ में लिखूँ क्या
अंदाज़ हैं ग़ज़ब के तेवर भी हैं बला के
तलहा ये रंग यूँ ही आए नहीं ग़ज़ल में
हम साथ चल रहे हैं बहती हुई हवा के
10
1 Like
सीने में मेरे दिल ये धड़कता है के तुम हो
साँसों पे किसी और का कब्ज़ा है के तुम हो
साँसों पे किसी और का कब्ज़ा है के तुम हो
तन्हा मैं चला जाता हूँ हर राह पे फिर भी
हर मोड़ पे एहसास ये होता है के तुम हो
अंदाज़ ए सुख़न देख के कहते हैं ये अहबाब
शे'रों में मेरे मीर का लहजा है के तुम हो
ग़म इस का नहीं छोड़ दे तन्हा ये ज़माना
अब मुझ को फ़क़त तुम पे भरोसा है के तुम हो
जो आता है साए की तरह ख़्वाब में अक्सर
वो मेरा कोई चाहने वाला है के तुम हो
तलहा वो तुम्हें सामने लाएँ भी तो कैसे
सब से तो इसी बात का झगड़ा है के तुम हो
9
2 Likes
तेरी ता'रीफ़ बताने को ग़ज़ल कहते हैं
हम कहाँ नाम कमाने को ग़ज़ल कहते हैं
हम कहाँ नाम कमाने को ग़ज़ल कहते हैं
जब तेरी आँखों से पी लेते हैं इक जाम कभी
ख़ुद को फिर होश में लाने को ग़ज़ल कहते हैं
जब कभी हम से ख़फ़ा होती है वो जाने ग़ज़ल
रात फिर उस को मनाने को ग़ज़ल कहते हैं
दूसरों के लिए हम राह-ए-अदब पर चल कर
नक़्श-ए-पा अपना बनाने को ग़ज़ल कहते हैं
हम से जो दूर रहा करते हैं उन को अक्सर
दिल की आवाज़ सुनाने को ग़ज़ल कहते हैं
ज़िंदगी फ़िल्म की मानिंद हुई है जबसे
अपना किरदार निभाने को ग़ज़ल कहते हैं
एक हम ही नहीं जितने भी हैं शाइ'र तलहा
अपनी पहचान बनाने को ग़ज़ल कहते हैं
8
1 Like
7
2 Likes
बे-वफ़ाई तेरी हौसला दे गई
इतने टूटे सितम शे'र कहने लगे
तेरे जाने से ये फ़ाइदा तो हुआ
आज हम कम से कम शे'र कहने लगे
गर भरोसा न हो आके ख़ुद देख लो
हम तुम्हारी क़सम शे'र कहने लगे
ज़िंदगी में कई बार ऐसा हुआ
जब भी रूठा सनम शे'र कहने लगे
जब अचानक कभी याद तुम आ गए
हो गई आँख नम शे'र कहने लगे
तेरे आने की जिस दम ख़बर मिल गई
आ गया दम में दम शे'र कहने लगे
इक तअ़ल्लुक़ वफ़ाओं का रक्खा मगर
जब भी टूटा भरम शे'र कहने लगे
नींद 'तलहा' न जब रात को आई तो
ले के काग़ज़ क़लम शे'र कहने लगे
6
2 Likes
तेरी जब से इनायत हो गई है
मेरी दुनिया ही जन्नत हो गई है
मेरी दुनिया ही जन्नत हो गई है
मैं अब उस की ज़रूरत हो गया हूँ
वो अब मेरी ज़रूरत हो गई है
हसीं इतनी मेरी क़िस्मत कहाँ थी
मगर तेरी बदौलत हो गई है
सनम जब से मिला है साथ तेरा
मुझे जीने की आदत हो गई है
मोहब्बत में कहाँ पाकीज़गी अब
बराए वस्ल चाहत हो गई है
सँभलती ही नहीं है अब सँभाले
जवानी इक मुसीबत हो गई है
बढ़ी है आज कल ता'लीम 'तलहा'
मगर तहज़ीब रुख़सत हो गई है
5
6 Likes
4
9 Likes
3
7 Likes
जब भी तेरा मिज़ाज बदलने की चाह की
अपना मिज़ाज ख़ुद ही बदलना पड़ा मुझे
रहता था उस के दिल में जो छोड़ा उसे तो आज
आँखों से अश्क बनके निकलना पड़ा मुझे
वादे पे अपने वो नहीं आई जो डेट पर
अरमान अपने दिल का कुचलना पड़ा मुझे
मेरा नसीब बनके रहा मेरा हम सफ़र
हर गाम उस के साथ ही चलना पड़ा मुझे
पैग़ाम देने आया था "तलहा" मैं अम्न का
लेकिन सितम की गोद में पलना पड़ा मुझे
2
6 Likes
दूर जाने की बात मत करना
दिल दुखाने की बात मत करना
दिल दुखाने की बात मत करना
तुम हमारे हो हम तुम्हारे हैं
अब ज़माने की बात मत करना
एक दूजे के दिल में रहना है
आशियाने की बात मत करना
हम तुम्हें याद कर के जीते हैं
भूल जाने की बात मत करना
आज मुद्दत के बा'द आए हो
जल्दी जाने की बात मत करना
तुम जहाँ छोड़ कर गए थे हमें
उस ठिकाने की बात मत करना
अब न रूठेंगे हम कभी 'तलहा'
तुम सताने की बात मत करना
1
6 Likes










