तेरी ता'रीफ़ बताने को ग़ज़ल कहते हैं
हम कहाँ नाम कमाने को ग़ज़ल कहते हैं
जब तेरी आँखों से पी लेते हैं इक जाम कभी
ख़ुद को फिर होश में लाने को ग़ज़ल कहते हैं
जब कभी हम से ख़फ़ा होती है वो जाने ग़ज़ल
रात फिर उस को मनाने को ग़ज़ल कहते हैं
दूसरों के लिए हम राह-ए-अदब पर चल कर
नक़्श-ए-पा अपना बनाने को ग़ज़ल कहते हैं
हम से जो दूर रहा करते हैं उन को अक्सर
दिल की आवाज़ सुनाने को ग़ज़ल कहते हैं
ज़िंदगी फ़िल्म की मानिंद हुई है जबसे
अपना किरदार निभाने को ग़ज़ल कहते हैं
एक हम ही नहीं जितने भी हैं शाइ'र तलहा
अपनी पहचान बनाने को ग़ज़ल कहते हैं
— Talha Lakhnavi















