जा ग़मो को सुना करे कोई
मुझ से भी तो वफ़ा करे कोई
ज़ख़्म गर हो इलाज है मुमकीन
इश्क़ गर हो तो क्या करे कोई
अब दुआ का असर नहीं होता
मेरे हक़ बद-दुआ करे कोई
न सहे कोई जो सहा मैं ने
हश्र का क़हर वा करे कोई
अब तो तालिब ख़ता है उम्मीदें
मुझ से मुझ को जुदा करे कोई
— Mohammad Talib Ansari















