उसे हँसते हुए भी देखा शायद ग़म तो ज़्यादा है
निगाहें उस की क़ातिल और चेहरा कितना सादा है
ज़माने भर में है मशहूर बनके ख़्वाब आया है
मगर चुप हूँ मेरा दिल पूछता है क्या इरादा है
मेरी बातों में उस का ज़िक्र तो है ज़िक्र भी तो ये
किसी के बोझ जैसा है कि जो इस दिल पे लादा है
हमें लगता नहीं है इस ज़माने में कहीं ग़म है
किसी को रोते देखा तो लगा सचमुच में ज़्यादा है
किसी के ख़्वाब लिखता हूँ मगर मैं चुप ही रहता हूँ
मुझे मालूम है ये ग़म मेरे ग़म का भी आधा है
सुनो मैं जो भी लिखता हूँ मगर क्या ख़ाक लिखता हूँ
हमेशा पढ़ने वालों ने लिखा मुझ से भी ज़्यादा है
— Umashankar Lekhwar















