बिखरने सँवरने को जी चाहता है
कि फिर जीने मरने को जी चाहता है
किया आज तक जो नहीं ज़िन्दगी में
वो सब कर गुज़रने को जी चाहता है
किसी की निगाहों की गहराइयों में
मेरा भी उतरने को जी चाहता है
लगे फीकी फीकी सी जो ज़ीस्त उस
में
नए रंग भरने को जी चाहता है
किसी की किए बिन कोई फ़िक्र 'गुलशन'
करो वो जो करने को जी चाहता है
— Gulshan















