कहा किस ने कि वो सुनता नहीं है
अलग है बात कुछ कहता नहीं है
वो अपने आप में रहता है गुम-सुम
किसी से खुल के वो मिलता नहीं है
अकेले चलने की आदत है उस को
किसी के साथ वो चलता नहीं है
लगे पत्थर सा रक्खे मोम का दिल
वो अच्छा है मगर लगता नहीं है
वो धोक़े खा चुका अब तो किसी पर
भरोसा रत्ती भर करता नहीं है
उसी ही वक़्त लौटा दे है दुगना
वो एहसां तक कभी रखता नहीं है
वो तो 'गुलशन' है बाँटे नूर सब को
किसी के नूर से जलता नहीं है
— Gulshan















