इश्क़ के रास्ते से गुज़रा हूँ
मैं कई हादसे से गुज़रा हूँ
हुस्न पर अपने नाज़ मत करना
हुस्न के मक़बरे से गुज़रा हूँ
याद आता नहीं है कुछ मुझ को
कौन से रास्ते से गुज़रा हूँ
रात भर अश्क इस लिए टपके
सारा दिन क़हक़हे से गुज़रा हूँ
वस्ल फिर वहशत-ओ-जुनूँ फिर हिज्र
हर नए मरहले से गुज़रा हूँ
ख़ुद से बेहतर लगे सभी मुझ को
जब कभी आइने से गुज़रा हूँ
मेरी हस्ती का मा-हसल यूँ है
उम्र भर तजरिबे से गुज़रा हूँ
— Waseem Siddharthnagari















