रब की उल्फ़त फ़क़त दाइमी है
वरना हर एक शय आरज़ी है
आरज़ू है उसे भूल जाऊँ
हाँ मगर आरज़ू आरज़ी है
मेरा अपना तआ'रुफ़ है इतना
मैं जो कुछ हूँ मेरी शा'इरी है
तू मुझे भूल बैठा है फिर तो
मुझ पे भी भूलना लाज़मी है
तेरे दर का सवाली हूँ मौला
और यही कुल मेरी बंदगी है
— Waseem Siddharthnagari















