bojh yaar gumnaami ka saha nahin jaata | बोझ यार गुमनामी का सहा नहीं जाता

  - Zain Aalamgir

बोझ यार गुमनामी का सहा नहीं जाता
कौन हूँ किसी का किस सेे कहा नहीं जाता

के बसे सभी वो मायूस आँख में चहरे
आँख में मिरी अब मुझको रहा नहीं जाता

झूठ से करूँ ज़ख़्मों की इधर लगे मरहम
फिर बदन म' सच का घूँट-ए-दवा नहीं जाता

मौत से मिले जब वो शख़्स एक दफ़ा, लगता
ज़िंदगी से' फिर बिलकुल भी मिला नहीं जाता

शख़्स बेसबब लेता रूठने, गिलों का फ़न
पर मुझे मनाने का हक़ बता नहीं जाता

मुंतज़िर-ए-तसकीन-ए-रहबरा मगर अब तो
बन चराग़ मुझ सेे अब औ' जला नहीं जाता

उठ सके न, होती तकलीफ़, हाथ डरते की
हर्फ़ ये लबों पर फिर बन दु'आ नहीं जाता

'ज़ैन' लोग बे-मानी दे रहे हमें वा'दा
अब मगर सुना ये लफ्ज़-ए-वफ़ा नहीं जाता

  - Zain Aalamgir

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