kab se aadha hai mahtaab mira | कब से आधा है माहताब मिरा

  - Aamir Azher

कब से आधा है माहताब मिरा
पूरा होता नहीं है ख़्वाब मिरा

जिस की चाहत ही एक नेकी हो
उस पे क़ुर्बान हर सवाब मिरा

तेरी दुनिया है ख़्वाब की दुनिया
मेरी आँखों में है सराब मिरा

सुर्ख़ सा चाँद और सियाह सी रात
उन की ज़ुल्फ़ों में हो गुलाब मिरा

मुझ को दीवानगी का होश नहीं
होश ही रह गया जवाब मिरा

कब से बैठा हुआ हूँ चौखट पे
जाने किस सम्त में है बाब मिरा

तारे गिनते हुए लगा 'आमिर'
कुछ बिगड़ ही गया हिसाब मिरा

  - Aamir Azher

Ishaara Shayari

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