कहाँ तुम मुल्क के दुश्मन को दहशत-गर्द कहते हो
उलट कहना है इस कारण उसे हमदर्द कहते हो
तुम्हारे शोर में पीड़ा हमारी कौन सुन पाता
ग़ज़ब हो रात-दिन चिल्ला के झूटा दर्द कहते हो
शिकायत चीख़ कर करने से हासिल कुछ नहीं होगा
पता है आदतन तुम तो हरे को ज़र्द कहते हो
हमेशा से तिलक बन कर ये माथे पर विराजे हैं
बहुत पावन हैं ये रज-कण जिसे तुम गर्द कहते हो
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